कल जीवित्पुत्रिका यानि जितिया व्रत है जो बच्चे के लिए किया जाता है। जीवित्पुत्रिका व्रत जो बहुत कठिन व्रत है, निर्जला व्रत रहती हैं महिलाएं जो कभी 24 घंटे तो कभी 36-40 घंटे का भी होता है। यह मुख्यतः बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है।
कल इस व्रत का नहाय खाय है, 02 अक्टूबर शुक्रवार को, इस दिन महिलाएं बाल धोकर नहाती और पितरों को इस दिन सरसों तेल और खल्ली( सरसों तेल से जो अवशेष निकलता) देती है। 7 बार बाएं उल्टे हाथ की छोटी अंगुली से 7 बार दिया जाता है और कहा जाता जहां मेरे पुर्वज है उनको हम प्रणाम करते।
फिर इस दिन खाना का कुछ खास नियम नहीं है, आप नमक, तेल, प्याज, लहसुन कुछ भी खा सकते। हमारे यहां तो मछली खाते हैं लेकिन जो भेज हैं वो दाल का पिट्ठा खाती। पहले तो जितना बच्चा होता था उतना मछली निगलते थे। मेरी नानी अपने समय में 5 मछली निगलती थी, छोटी मछली होती है। मां भेज हैं तो वो पिट्ठा बनाती सो निगलती।
इस दिन मरूआ(रागी) आटा का रोटी खाया जाता और झिंगली (छोटा नेनुआ)की सब्जी खाई जाती। मरूआ खाने का कारण है कि मरूआ बहुत छोटा होता, माएं अपने भगवान से कहती भगवान इस मरूआ जैसे भी मेरे बच्चे के शरीर में प्राण बनाएं रखना। उस पर कभी कोई आंच ना आएं...
फिर सुबह उठकर ओठगन होता जिसमें दही, चुरा, खाते हैं, पान खाते हैं। पान खाने का नियम है खाना ही चाहिए। इसी दिन मां दुर्गा का जीभ भी मुर्ति में पड़ता है। ओठगन शनिवार के सुबह 4 बजे तक है। आप पानी पी सकते, खा सकते।
3 अक्टूबर शनिवार को पुरा दिन फिर व्रत है, जो निर्जला व्रत होता है। उस दिन पितरों को 7 बार जल देते हैं। पुरा दिन कुछ खाना पीना नहीं। घर में पुजा करना चाहिए, जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा पढनी चाहिए फिर फल नैवेद्य अर्पित कर प्रणाम कर लें।
अगले दिन रविवार 4 अक्टूबर को सुबह 7.30 में पारण है, उसमें खीरा और कुशिया मटर आता जो बहुत हार्ड होता उसे रात भर भिगोकर रखा जाता। फिर चिल्ह और सियार के नाम से चढ़ाया जाता। चिल्ह और सियार की कहानी अगले पोस्ट में....


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